Tuesday, September 29, 2015

चार ओळी….


ए जिंदगी…. जितना गम देना है … दे दे …. 
पर थोडासा गम तू संभाल के रखना…. 
क्यूंकि…. 
हजम कर लेंगे हम ये सारा जहर…. गुंजाईश अभी बाकी है…. 
टुटे हुए इस परिंदे में…. जीने कि ख्वाईश अभी बाकी है…

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दैव कोलमडून पाडतंय मांडव तुझा…. 
एक  एक खांब मुळासकट उपटून…. 
पण सांग त्याला… 
पालं राहिलंच कि ऊभं फक्त एका काठीचा आधार घेऊन…. 
अगदी विश्वासानं…. 

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मी पाहिलाय…. एक पर्वत कोसळताना… 
उत्तुंग महामेरू… कणाकणाने ढासळताना…. 
पण…. 
टेकडी म्हणून राहिला असला… तरी आजही तितकीच रग भरून आहे…. 
उरल्या सुरल्या मातीच्या कणाकणात… अजूनही एक आशा तग धरून आहे…. 

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आडवे… तिडवे… कसेही… घालू देत त्याला घाव…. 
सुरेख मूर्ती बनेल… तेव्हाही खाऊ देत त्यालाच भाव… 
पण…
देव बनशील जेव्हा तू…. तेव्हा तोच घेईल तुझ्याकडे धाव…. 
शेवटी कळेलच कि त्याला…. नक्की कुणी जिंकला हा डाव…. 

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असं नेहमीच होतं…. 
आभाळ दाटून आलं… कि आठवणीही दाटून येतात…. 
अन त्यातल्याच काहीशा… शब्दधारा बनून कागदावर बरसतात…. 

- टिंग्याची आई

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