On special request by Arun... Thank you Arun for being the inspiration of this poem.... :)
Feel karke likhe hai... hope you like it... ;)
हर सुबह का सूरज… तुझे देखे बिना निकलता है…
बिना कुछ खाये-पिए… तेरा बेटा ऑफिस चल पड़ता है…
सोचता हूँ माँ होती यहाँ… तो मेरा कितना खयाल रखती…
मेरी हर छोटी बड़ी चीज का… प्यार से ध्यान रखती…
पर जितना भी हम सोचे… सिर्फ तेरी याद ही आती है…
तेरे ममताभरे आँचल कि कमी… मखमल से भी पूरी न हो पाती है…
जब सर पे तेरा हाथ नहीं सिर्फ खुला आसमाँ होता है…
माँ… तब घर याद आता है…
आपहीने सिखाया था पापा… शराब बुरी चीज होती है…
फिर भी हर Friday यहाँ… बोतले खाली होती है…
दुआ भी करते है उस बिच… आपका फोन ना आए…
अपने होनहार बेटे को… पापा इस हालत में कभी ना पाए…
ऐसीही कुछ गलतियाँ… आजकल जानबूजके हो जाती है…
कोई संभालने वाला हो… तो हर उलझन सुलझ जाती है…
जब गलतियों पे हक़ डाँटने वाला कोई नहीं होता है.…
पापा… तब घर याद आता है…
हर राखी का त्यौहार… तेरी बहुत याद दिलाता है… कुरियर से आई राखी… भाई अपने आप ही बाँध लेता है…
तेरी हर मांग, हर शिकायत… आज भी प्यारी लगती है…
आज भी जब बिना भूले… हर बड़ेपे तेरीही फर्स्ट विष होती है…
फेसबुक मेल या फोन… पगली बातें तो बहुत होती है…
दर्द तो तब होता है… जब तुझे एक जादू कि झप्पी देनी होती है…
जब किसी प्यारीसी गुड़िया को प्यार करनेका मन करता है…
बेहना… तब घर याद आता है…
इस अनजाने शहर में हर दिन… कोई न कोई झोल होता है…
लड़ तो अकेले भी लेंगे हम… पर किसीका हाथ चाहिए होता है…
वैसे तो घरवालोंसे हमेशा… हर चोट बखूबी छुपाते है…
पर कोई चुपकेसे मरहम लगा दे… ये भी तो हम चाहते है…
हर सिक्रेट जिससे शेयर करे… वो भाई ही तो होता है…
बचपन का हर झगड़ा… अपना प्यार ही तो बढ़ाता है…
लेकिन जब दिल किसीको गले लगाना चाहता है…
भाई… तब घर याद आता है…
वीकेंडपे रूम कि खाली दीवारें… बहुतही सताती है…
जहाँ कभी मैं अकेला न था… उस छत कि याद दिलाती है…
कोई अपना नहीं है ये… पर अपनों से कम नहीं है…
जहा माँ-पापा है… और जहाँ कोई गम नहीं है…
एक आशियाना है ये… अपनों को डोरी में बांधे रखता है…
दुःख हो या सुख… यहाँ हर कोई मुस्कुराता रहता है…
छोटीसी कुटीया या बड़ी हवेली… अपना घर अपना होता है…
लौट जाऊ उस खुशियों के आँगन में… दिल हर रोज यही सपना देखता है…
जब कोई अपना पास नहीं होता है…
तब घर से दूर आए इस पंछी को…
अपना घर याद आता है… हर पल घर याद आता है.…
:)
- टिंग्याची आई
Feel karke likhe hai... hope you like it... ;)
हर सुबह का सूरज… तुझे देखे बिना निकलता है…
बिना कुछ खाये-पिए… तेरा बेटा ऑफिस चल पड़ता है…
सोचता हूँ माँ होती यहाँ… तो मेरा कितना खयाल रखती…
मेरी हर छोटी बड़ी चीज का… प्यार से ध्यान रखती…
पर जितना भी हम सोचे… सिर्फ तेरी याद ही आती है…
तेरे ममताभरे आँचल कि कमी… मखमल से भी पूरी न हो पाती है…
जब सर पे तेरा हाथ नहीं सिर्फ खुला आसमाँ होता है…
माँ… तब घर याद आता है…
आपहीने सिखाया था पापा… शराब बुरी चीज होती है…
फिर भी हर Friday यहाँ… बोतले खाली होती है…
दुआ भी करते है उस बिच… आपका फोन ना आए…
अपने होनहार बेटे को… पापा इस हालत में कभी ना पाए…
ऐसीही कुछ गलतियाँ… आजकल जानबूजके हो जाती है…
कोई संभालने वाला हो… तो हर उलझन सुलझ जाती है…
जब गलतियों पे हक़ डाँटने वाला कोई नहीं होता है.…
पापा… तब घर याद आता है…
हर राखी का त्यौहार… तेरी बहुत याद दिलाता है… कुरियर से आई राखी… भाई अपने आप ही बाँध लेता है…
तेरी हर मांग, हर शिकायत… आज भी प्यारी लगती है…
आज भी जब बिना भूले… हर बड़ेपे तेरीही फर्स्ट विष होती है…
फेसबुक मेल या फोन… पगली बातें तो बहुत होती है…
दर्द तो तब होता है… जब तुझे एक जादू कि झप्पी देनी होती है…
जब किसी प्यारीसी गुड़िया को प्यार करनेका मन करता है…
बेहना… तब घर याद आता है…
इस अनजाने शहर में हर दिन… कोई न कोई झोल होता है…
लड़ तो अकेले भी लेंगे हम… पर किसीका हाथ चाहिए होता है…
वैसे तो घरवालोंसे हमेशा… हर चोट बखूबी छुपाते है…
पर कोई चुपकेसे मरहम लगा दे… ये भी तो हम चाहते है…
हर सिक्रेट जिससे शेयर करे… वो भाई ही तो होता है…
बचपन का हर झगड़ा… अपना प्यार ही तो बढ़ाता है…
लेकिन जब दिल किसीको गले लगाना चाहता है…
भाई… तब घर याद आता है…
वीकेंडपे रूम कि खाली दीवारें… बहुतही सताती है…
जहाँ कभी मैं अकेला न था… उस छत कि याद दिलाती है…
कोई अपना नहीं है ये… पर अपनों से कम नहीं है…
जहा माँ-पापा है… और जहाँ कोई गम नहीं है…
एक आशियाना है ये… अपनों को डोरी में बांधे रखता है…
दुःख हो या सुख… यहाँ हर कोई मुस्कुराता रहता है…
छोटीसी कुटीया या बड़ी हवेली… अपना घर अपना होता है…
लौट जाऊ उस खुशियों के आँगन में… दिल हर रोज यही सपना देखता है…
जब कोई अपना पास नहीं होता है…
तब घर से दूर आए इस पंछी को…
अपना घर याद आता है… हर पल घर याद आता है.…
:)
- टिंग्याची आई






Awsome……….sach me sab kuch itnisi line mai kaise likh diyaaa yaar…hats off...
ReplyDeleteThanks for this comment Madhura... :)
"Nice"
ReplyDeleteIts Ur world... as u see it.. even though its for someone else or inspired by someone else
the thoughts are urs Shilpa.. :)
Thank you so much for above comment Prasad.... :)
Shilpa, this one is really touching.Reminds me of the everything we left behind just to get everything in our life, making our life complete but still not so complete at the same time.
ReplyDeleteI think you have come to that level of maturity where you just strike at the core of heart of people right away.
Thank you for composing.
Thank you sooooooooo much Amit for this lovely comment.. It means a lot to me...
ReplyDeleteand I think the comment is better than the poem itself.. ;)
Thanks :)
True & nice poem Shilpa...Keep it up...
ReplyDeleteThank you so much... :)
DeleteDil se respect nikalti hai Shilpa Mam aapke liye.. so emotional lines
ReplyDeleteThank you so much re Hero... :)
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